ये है रास्ते झिंदगी के जिस पे ना चाहते भी सब चलते है और चाह के भी ..उम्मीदे बहोत है झिंदगी के रास्तो से क्यो की हर मोड़ यहाँ अजनबी है। लाखो लोग है इस राह में । कहने को कई है अपने और कई अजनबी । पर है सवाल वही कौन अपने और कौन अजनबी । कई बार लगता है किसी अजनबी को मिल के अपना सा तो कई अपने होते है अजनबी ...........
शरद आचार्य
Thursday, 25 June 2009
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