Saturday, 11 July 2009

जा रहा था मंजिल की और रास्ता भटक गया । धुन्धने निकला रास्ता तो कही पे फस गया । चलता रहा उन राहो पे मंजिल को धुन्ध्ते । कटता गया रास्ता न मिली मंजिल । फ़िर जा के सोचा कोन सी है मेरी मंजिल । इस जहाँ में अगर मंजिल धुंध ली तो क्या बचेगा झिंदगी में । वही पे राह में सोचा । मत सोचो मंजिल को । चलते रहो नए कारवां बना के । जब मिलनी होगी मंजिल मिले । क्यो बिगाडे इस सफर का मज़ा उसे सोचते हुए .....
शरद आचार्य

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