Sunday, 28 June 2009

बेठे थे किनारे पे समुंदर के सामने । उठी लहरे दिल में उन की याद में । जेसे लहरे टकराती है समंदर के की किनारे से । वो भी आए थे जिंदगी में ऐसे ही हमारे । लहरे चली जाती है निसान छोड़ के । एक और लहर आती है उन निशानों को मिटाने । एक लहर आई थी जिंदगी में मेरे भी । निशान छोड़ गई अपने कितने आज भी जिन्दा हू उन निशानों के साथ उम्मीद में के उनको मिटने वाली कोई लहर आए ..........

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